SWAMI VIVEKANAND-ABOUT LIFE-SHORTBIOGRAPHY

SWAMI VIVEKANAND

स्वामी विवेकानंद. एक युवा संन्यासी, जिन्होंने भारतीय संस्कृति को विदेशों में पहचान दिलाई. साहित्य, इतिहास और आध्यात्म की अद्भुत जानकारी रखने वाले विवेकानन्द को एक ऐसे आध्यात्मिक गुरू के तौर पर जाना जाता है, जो हिन्दू धर्म को प्रोग्रेसिव और व्यवहारिक बनाने के समर्थक रहे.

स्वामी विवेकानन्द स्वामी विवेकानन्द का बचपन

स्वामी विवेकानन्द स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 फरवरी , सन् 1863 ई ० को , पौष कृष्ण सप्तमी तिथि के दिन कलकत्ते के सिमला मुहल्ले में हुआ था । इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त तथा माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था । स्वामी विवेकानन्द के बचपन का नाम नरेन्द्र दत्त था । माता भुवनेश्वरी देवी शिवजी की भक्त थीं । शिवजी की उपासना से ही बालक नरेन्द्र का जन्म हुआ था । बचपन से ही नरेन्द्र के नटखटपन की कोई सीमा नहीं थी ।

डराने – धमकाने और डॉट – फटकारने के बाद भी उसे रोकते नहीं बनता था । चंचल बालक को गोद में लेकर माता कहती — ‘ ‘ काफी सिर धुनकर शिवजी से एक पुत्र माँगा था , पर उन्होंने भेज दिया एक भूत ।

नरेन्द्र के बचपन की नटखटपन तथा साहस की अनेक घटनाएँ सुनने में आती हैं । वह सब तो जैसे रोज की ही वात थी । तभी तो विश्व – विजयी बनकर अमेरिका से लौट आने के बाद अपने शिष्यों से विनोद करते हुए उन्होंने कहा था — ” मैं बड़ा नटखट था , अन्यथा क्या यों ही सारी दुनिया घूमकर आ सकता था । “

बचपन से ही दीन – दुखियों का कष्ट देखकर नरेन्द्र के प्राण रो उठते थे । पास देने योग्य कुछ न होने पर बालक उन्हें अपने अंग के वस्त्र दे डालता । नरेन्द्र पढ़ने में बहुत ही तेज थे । सन् 1879 ई ० में उन्होंने मेट्रिक परीक्षा पास की । कालेज में रहकर उन्होंने साहित्य , दर्शन तथा इतिहास आदि विषयों को पढ़ा और बी ० ए ० परीक्षा बड़ी योग्यता से पास की । दर्शनशास्त्र नरेन्द्र का प्रिय विषय था ।

बाल्यावस्था से ही नरेन्द्र का मन धर्म – भाव से परिपूर्ण था । उन दिनों ब्रह्म समाज का जोर था । ब्रह्म समाज की रविवारीय उपासना के समय मधुर संगीत गाकर नरेन्द्र सबको मंत्रमुग्ध कर देते थे ।

गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस से भेंट

Story of swami vivekananda and his guru Ramkrishna Paramhans
RAMKRISHN PARAMHANSH

सन् 1881 में नरेन्द्र की भेंट दक्षिणेश्वर के काली मन्दिर के पुजारी स्वामी रामकृष्ण परमहंस से हुई । किन्तु अट्ठारह वर्ष के युवक नरेन्द्रनाथ को पहली बार देखते ही श्री रामकृष्ण देव पहचान गये थे । उन्होंने जान लिया था कि नरेन्द्र कौन है एवं किसलिए जन्मा है । दक्षिणेश्वर से घर लौटने के बाद नरेन्द्र ने पढ़ाई – लिखाई में मन लगाने का प्रयत्न किया । किन्तु वह किसी तरह श्री रामकृष्ण को भूल नहीं पा रहे थे । अब वे बार – बार परमहंस के पास जाने लगे । एक दिन नरेन्द्र ने स्वामी जी से कहा — ” मुझे भी समाधि लगाना सिखा दीजिए । “

उस पर स्वामी जी ने कहा — ” नरेन्द्र तुम्हारा जन्म मानव कल्याण के लिए हुआ है । तुम्हारे अन्दर महान शक्तियाँ हैं उनसे तुम विश्व मानव जाति की सेवा करो । समाधि लगाकर अपने ही आनन्द में मग्न रहने का ध्यान मत करो । ”

किन्तु नरेन्द्र कव मानने वाले थे । उनके बार – बार आग्रह करने पर स्वामी जी ने उन्हें हल्का – सा स्पर्श कर दिया । उसके बाद नरेन्द्र समाधि में लीन हो गये । समाधि खुलने पर उन्हें ऐसे आनन्द का अनुभव हुआ , वैसा पहले कभी नहीं हुआ था । तत्पश्चात् उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरू मान लिया और उनके गयी अनुसार ही भजन एवं शयन करने लगे ।

एक दिन अचानक ही पिता का देहान्त हो गया । उनके उनकी पिता की काफी आय थी , किन्तु अधिक व्यय एवं दान आदि के छोड़कर नहीं जा सके , बल्कि काफी ऋण छोड़ गये । माता , भाई , बहन आदि छः – सात व्यक्तियों के अन्न , वस्त्र की जिम्मेदारी अब नरेन्द्र के ऊपर आ पड़ी । उन्होंने नौकरी की तलाश की , किन्तु उन्हें कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल सकी । तब रहेगा वे परमहंस की शरण में गये । स्वामी जी ने सलाह दी कि माँ काली से कहो । जब वे माँ काली के पास गये , तो उन्होंने बुद्धि और भक्ति माँगी । इस प्रकार उन्हें गृहस्थ जीवन से वैराग्य हो गया ।

अब नरेन्द्र रामकृष्ण परमहंस के धार्मिक उपदेशों से प्रेरित होकर सन्यासी हो गये । श्री रामकृष्ण ने उन्हें त्याग मंत्र की शिक्षा दी । अब उनका नाम स्वामी विवेकानन्द हो गया । स्वामी रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के पश्चात् विवेकानन्द ने कलकत्ता छोड़ दिया । उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष की यात्रा की । इस यात्रा के दौरान ही उन्होंने पाणिनि के अष्टाध्यायी तथा धर्म – ग्रन्थों का अध्ययन किया । अपनी इस यात्रा में उन्होंने भारतवर्ष के असली रूप को देखा । भारत की साधारण जनता की दुर्गति देखकर उनका हृदय रोने लगा । केवल भारतवर्ष ही नहीं , सभी देशों की सभी जातियों के लिए उनके प्राण रोया करते थे । कन्याकुमारी के समुद्र तट का प्राकृतिक सौन्दर्य उन्हें बहुत अच्छा लगता था ।

शिकागो नगर में विश्व धर्म सम्मेलन

सन् 1893 ई ० में अमेरिका के शिकागो नगर में विश्व धर्म सम्मेलन प्रारम्भ हुआ । जिसमें विश्व के सभी धर्माचार्यों ने भाग लिया । स्वामी विवेकानन्द के शिष्यों ने धन एकत्र कर उन्हें हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में भेजा था । सम्मेलन की तिथि बदल गयी थी । उन्हें कुछ दिन अमेरिका में ठहरना था । स्वामी जी के पास धन का अभाव था और कोई परिचित न था । इसी मध्य उनकी भेंट एक सहृदय अमेरिकन महिला से हो गयी । उस महिला के से उनका परिचय हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर से हुआ । प्रोफेसर स्वामी जी के ज्ञान से बहुत प्रभावित हुए । उन्होंने स्वामी जी के सम्मेलन में सम्मिलित होने की व्यवस्था की । सितम्बर , सन् 1893 ई ० का दिन इतिहास में अमर रहेगा क्योंकि इसी दिन विश्व धर्म सम्मेलन हुआ । जहाँ एक से बढ़कर एक विद्वान उपस्थित थे । उनमें विवेकानन्द सबसे कम आयु के थे । इस सम्मेलन के द्वारा ही हिन्दू धर्म का गौरव बढ़ा तथा पूर्व तथा पश्चिम का अभूतपूर्व मिलन हुआ । सभापति द्वारा आमन्त्रित प्रतिनिधियों ने पहले से तैयार अपने भाषणों के माध्यम से अपने धर्म के सम्बन्ध में बिचार प्रकट किये । स्वामी जी कुछ लिखकर नहीं ले गये थे । उन्होंने खड़े होकर ” अमेरिकावासी बहनों एवं भाइयों ‘ कहकर सभा को सम्बोधित करना शुरू किया तो सारा वातावरण तालियों से गूंज गया । स्वामी जी ने कहा- “ संसार के सभी धर्म एक ही धर्म के अंग हैं । उनमें भेदभाव करना मूर्खता है । विश्व में केवल एक आत्मतत्व है , सब कुछ केवल उसकी अभिव्यक्तियाँ हैं । “

हिंदुत्व का प्रसार

शिकागो सम्मेलन का समाचार सम्पूर्ण विश्व में फैल गया । हिन्दू धर्म के विषय में विदेशों में जो गलत प्रचार था , वह दूर होने लगा । विवेकानन्द की प्रशंसा विश्व के सभी स्थानों पर की गयी । भारत का विदेशों में सम्मान बढ़ गया । इस समाचार के भारत पहुंचने पर यहाँ जागरण की लहर दौड़ गयी और भारत की आम में अपनी संस्कृति की रक्षा के प्रति संकल्प और अधिक बढ़ गया । इसके बाद स्वामी जी ने अमेरिका में अन्य जगहों पर भी भाषण दिये तथा वे एक वर्ष तक अमेरिका में रहे । वे इंग्लैण्ड भी गये । इंग्लैण्ड में उनकी भेंट मारग्रेट नोबेल से हुई । वह स्वामी जी से बहुत प्रभावित हुई । उनका नाम वहन निवेदिता रखा गया । उन्होंने भारत को अपना घर बनाकर मानव सेवा की । भारत वापसी में कन्याकुमारी में स्वामी जी ने सर्वप्रथम भारत माता की धरती पर पैर रखा और उन्होंने जमीन को चूम लिया ।

भारतवर्ष में स्वामी जी ने भाषण बहुत कम ही दिये । अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के नाम से ” रामकृष्ण मिशन ” की स्थापना की । इसके केन्द्र भारत के अतिरिक्त विश्व के अन्य देशों में भी हैं । इसका उद्देश्य मानव सेवा करना है ।

रामकृष्ण मिशन की सफलता तथा जनसेवा के लिए स्वामी जी ने अथक परिश्रम किया । जिसके कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया । 4 जुलाई , सन् 1902 को 39 वर्ष की अवस्था में विवेकानन्द का निधन हो गया । आज भी विवेकानन्द के नाम पर कई स्मारक एवं संस्थाएँ हैं , जो कि उस महान आत्मा की अमर सेवाओं के प्रति अपना आभार प्रकट करती हैं । स्वामी जी ने भारत माता का सिर गौरव से ऊंचा किया । उन्होंने बताया कि जब तक दुःख , दैन्य , अशिक्षा और अस्वास्थ्य रहेगा तब तक आम जनता की उन्नति नहीं होगी । आम जनता की उन्नति होने पर ही भारत का यथार्थ जागरण होगा । इस जागरण के नायक हैं स्वामी विवेकानन्द ।

 भारत में विवेकानंद को एक देशभक्त संन्यासी के रूप में माना जाता है और उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन

  1. उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता।
  2. एक समय में एक काम करो और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकि सब कुछ भूल जाओ
  3. एक अच्छे चरित्र का निर्माण हजारो बार ठोकर खाने के बाद ही होता है।
  4. एक विचार लें और इसे ही अपनी जिंदगी का एकमात्र विचार बना लें। इसी विचार के बारे में सोचे, सपना देखे और इसी विचार पर जिएं। आपके मस्तिष्क , दिमाग और रगों में यही एक विचार भर जाए। यही सफलता का रास्ता है। इसी तरह से बड़े बड़े आध्यात्मिक धर्म पुरुष बनते हैं।

महत्त्वपूर्ण तिथियाँ

  • 12 जनवरी 1863 — कलकत्ता में जन्म
  • नवम्बर 1881 — रामकृष्ण परमहंस से प्रथम भेंट
  • 16 अगस्त 1886 — रामकृष्ण परमहंस का निधन
  • 30 जुलाई 1893 — शिकागो आगमन
  • अगस्त 1893 — हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो॰ जॉन राइट से भेंट
  • 11 सितम्बर 1893 — विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान
  • 27 सितम्बर 1893 — विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में अन्तिम व्याख्यान
  • 16 मई 1894 — हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषण
  • नवंबर 1894 — न्यूयॉर्क में वेदान्त समिति की स्थापना
  • 31 जुलाई 1899 — न्यूयॉर्क आगमन
  • 22 फ़रवरी 1900 — सैन फ्रांसिस्को में वेदान्त समिति की स्थापना
  • 4 जुलाई 1902 — महासमाधि

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human mind-मशीन से भी आगे

human mind-टी.वी. देखने की प्रक्रिया में दिमाग़ बहुत कम इस्तेमाल होता है और इसलिए इससे बच्चों का दिमाग़ जल्दी विकसित नहीं होता । बच्चों का दिमाग़ कहानियां पढ़ने से और सुनने से ज्यादा विकसित होता है क्योंकि किताबों को पढ़ने से बच्चे ज्यादा कल्पना करते हैं ।

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