defect in crystal-chapter-1-chemistry

आप सभी को नमस्कार , New RADIANT EDUCATION के CHEMISTRY सेक्शन में आपका फिर से स्वागत है आज हम लाये हैं आप के लिए CHEMISTRYके CLASS 12 के महत्वपूर्ण क्रिस्टल दोष NOTES..

★ आइये आज हम क्रिस्टल दोष व उनके प्रकार के बारे में जानते है –

क्रिस्टल दोषकिसी क्रिस्टल में घटक कणों के पूर्ण रूप से नियमित क्रम में कोई अपूर्णता दोष क्रिस्टल दोष कहलाता है।

“किसी ठोस या क्रिस्टल के अवयवी कणों की आदर्श व्यवस्था से अनियमितता या कोई विचलन या अशुद्धि उत्पन्न होना क्रिस्टल या ठोस में दोष या अपूर्णता कहलाता है।


क्रिस्टल दोष मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं इस POST में हम यहां पर एक ही प्रकार के दोष का अध्ययन करेंगे।
क्रिस्टल दोष के प्रकार-
★ बिंदु दोष ( point defect)
★ इलेक्ट्रॉनिक दोष ( elecetronic defect)
★ रेखीय दोष ( linear defect)

बिंदु दोष – ये वे दोष हैं जो घटक कणो ( परमाणु /आयन ) कि अनियमित व्यवस्था के कारण उत्पन्न होती हैं इस दोष में कोई धनायन या ऋण आयन अपनी स्थिति छोड़कर अंतर काशी स्थल में व्यवस्थित हो जाता है ये दो प्रकार के होते है –
A . स्टॉइकियोमितीय दोष
( stoichiometric defect)
B. नाँन – स्टॉइकियोमितीय दोष (nonstoichiometric defect)

A .स्टॉइकियोमितीय दोष –

स्टॉइकियोमितीय क्रिस्टल होते हैं जिनमें धनायनो तथा चरणों की वही होती है जो संख्या कि उनके रासायनिक सूत्रों द्वारा प्रदर्शित अनुपात में होती है। जिस प्रकार AB यौगिक में A+ और B- आयनों की संख्या समान होती है ये दो प्रकार के होते है –


शॉटकीय दोष –

शॉटकीय दोष (schottky defect) यह दोष 1930 में जर्मनी के वैज्ञानिक शार्ट की ने बताया था यह दोष तब उत्पन्न होता है जब जालक में कुछ जालक बिंदु खाली रह जाते हैं इन खाली बिंदुओं को जालक रिक्तियां या छिद्र कहते हैं
यह संपूर्ण क्रिस्टल विद्युत उदासीन रहता है क्योंकि खाली स्थान उत्पन्न करने वाले धनायन तथा ऋण आयनओं की संख्या सदैव समान होती है।

उदा० CsCl, KBr , AgBr ,NaCl आदि ।


फ्रेंकल दोष ( frenkel defect) –

यह दोष 1930 में रूसी वैज्ञानिक फ्रैंकल ने बताया था इसे विस्थापन दोष कहते हैं यह दोष तब उत्पन्न होता है जब कोई आयन जालक बिंदुओं के मध्य अंतर काशी स्थान ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार के दोष में एक एक छिद्र उत्पन्न हो जाता है लेकिन इस क्रिस्टल के घनत्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

जब कोई आयन अपना निश्चित स्थान छोड़कर अंतराकाशी स्थान मे चले जाता है जिससे इसके निश्चित स्थान पर छिद्र या होल बन जाता है और उत्पन्न इस दोष को फ्रेंकेल दोष कहते है। … चूँकि क्रिस्टल के आवेश में कोई अंतर नहीं आता है इसलिए विद्युत उदासीनता बनी रहती है।

B. नाँन – स्टॉइकियोमितीय दोष –

जब क्रिस्टल में उपस्थित दोष के कारण धनायनो तथा वाहनों की संख्या का अनुपात परिवर्तित हो जाता है तो यह दोष नॉन B. नाँन – स्टॉइकियोमितीय दोष कहलाता है


ये दो प्रकार के होते है-

धातुअधिकता दोष –

धातु आधिक्य दोष (metal excess defect) जब किसी क्रिस्टल में कुछ ऋणायन क्रिस्टल छोड़कर चले जाते है और विद्युत उदासीनता बनाये रखने के लिए उनके स्थान पर इलेक्ट्रॉन आ जाते है तो इस प्रकार क्रिस्टल में धन आयन की मात्रा अधिक हो जाती है , इस प्रकार के दोष को धातु आधिक्य दोषकहते है या धनायन आधिक्य दोष भी कहते है।

धातुन्यूनता दोष –

यह दोष उस समय उत्पन्न होता है जब एक धनायन ( धातु आयन ) अपनी सामान्य जालक स्थिति में अनुपस्थित रहता है और उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में स्थित एक निकटवर्ती धातु आयन आवेश को सन्तुलित करता है ताकि क्रिस्टल की विद्युत उदासीनता बनी रहे ।

तो कैसी लगी आपको हमारी ये पोस्ट कमेंट करके जरूर बताएं साथ ही साथ हम नीचे विभिन्न महत्वपूर्ण टॉपिक से रिलेटेड लिंक भी दे रहे है जिन्हे विजिट जरूर करे

like

share

subscribe

नमस्कार जय हिन्द जय भारत

यादि आप कोई सुझाव या किसी प्रकार की कोई डिमांड है तो हमें लिख भेजिए हमारे जीमेल पर
हमारा जीमेल है

newradiant931@gmail.com

तो इसी तरह बने रहिये हमारे साथ ताकि हम ऐसे और भी एजुकेशन सपोर्ट आप तक पहुचाते रहे

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.